Sunday, September 25, 2022
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Darlings: प्यार के सांचे में मर्दानगी की सनक… संघर्ष और दर्द की दास्तां के लिए याद रखी जाएंगी आलिया भट्ट – Alia Bhatt Darlings film review Shefali Shah Vijay Varma and Roshan Mathew is amazing tmovf

‘अगर मैं तुम्हें प्यार नहीं करता तो मारता क्यों?.. और अगर तुम मुझे प्यार नहीं करती तो सहती क्यों?’ थाने की कोठरी में हमजा के ये शब्द बदरू के कदम पीछे खींच लेते हैं. मन को मना चुकी है अब और करना, जो जाए, दिल के कोने से कहीं आती है कि शायद अब अच्छे दिन आ जाएंगे. की पीड़ा का अंत हो जैसा आम महिलाएं हैं. बचाने , को पूरा की ललक, एक बेहतर तमन्ना, छोटा सा , एक अदद बच्चे की चाह उनके कदम रोक लेती है.

साथ मिलकर प्यार के घरौंदे बनाए थे अगर उसमें कुछ कमियां भी हैं तो उसे छोड़ देना ही रास्ता है क्या? शरीर में कहीं फोड़ा हो जाए तो उस हिस्से को काट थोड़े दिया जाता है. की कोशिश की जाती है. कोई है, सहता है, निभाता है लेकिन कई लोग टूट हैं, जाते हैं वो फैसला लेते हैं पहले पहले ले लेना चाहिए था.

चाह में बदरू ने अपनी खुशियों की चढ़ाई बलि

ऐसी ही जिंदगी है ‘डॉर्लिंग्स’ के हमजा और बदरुनिशा की. ही चॉल में रहते हैं. दूसरे से प्यार करते हैं मां को पसंद नहीं है. मां की पारखी नजरें भांप लेती हैं कि यह मेरी बेटी के काबिल नहीं है. की सरकारी नौकरी लगते ही सब बदल जाता है. जमाने में सरकारी नौकरी, इस भ्रम में आकर देश जाने कितनी लड़कियों की बलि दी गई है. खुद गई.

तक सब ठीक रहता है लेकिन बाद में हमजा के का शैतान जाग जाता है. उसकी जिंदगी में शराब पहले नंबर पर है, नौकरी दूसरे नंबर पर और आखिर में पत्नी का नंबर आता है. शराब पीता है बाद में उसे शराब पीने लगती. वह हर रात पीटता है. पीटता . सुबह पुचकारता है, है, रात के लिए माफी मांगता और नियति मानती है. खुद है. वह प्यार समझने की भूल किए बैठी है. भरी जिंदगी को नियति, लेकिन साथ में एक उम्मीद आज नहीं तो कल सब ठीक हो जाएगा.

को यह जलालत भरी जिंदगी देखकर गुस्सा आता है. की सफलता है कि हम सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि ये कैसा प्यार है आखिर बदरू बर्दाश्त क्यों कर रही है? की पिटी औरत सुबह हसबैंड लिए टिफिन कैसे तैयार कर सकती है? शायद यह बदरू की नहीं भारत की हजारों, लाखों की महिलाओं की है, परिवार बचाने जिम्मेदारी, की जिम्मेदारी उनकी है. है.

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हमजा और बदरू एकदम साधारण लोग हैं. बदरू बहुत पढ़ी-लिखी भी नहीं है. अपनी अस्मिता का ज्ञान भले ही न हो लेकिन वह रेसपेक्ट चाहती है, इज्जत चाहती है. बदले है. है कि जितना वह शौहर का ख्याल रखती है उतना ख्याल शौहर भी उसका रखे. प्यार . सपनों का साथ दे लेकिन किसी और का बना है. में है. में उलझ जाना बदरू की बदकिस्मती. हमजा पर नहीं बदरू पर आता है. ? ? दिमाग है भी कि नहीं, ऐसे मोड़ पर आप फिल्म में रम जाते हैं. बहाने उन औरतों के बारे में सोचने के लिए मजबूर हो हैं जो हर रोज घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं. उनके पास भी सहने के कोई चारा नहीं होगा.

लगती . गली मुहल्ले की, अपने किसी रिश्तेदार किसी मित्र की ऐसे हालातों से गुजरती है. जाने-आनजाने में वह देश की हर उस महिला का प्रतिनिधित्व लगती है जो घरेलू हिंसा का शिकार हैं. हमें याद आने लगते हैं शोषण के तरीके जो अलग-अलग हैं. बनाना तुम्हारी जिम्मेदारी, ठीक बने इससे बड़ी जिम्मेदारी, नहीं हो तो सहना तो पड़ेगा, किसी का शोषण दिखाई देता है किसी नहीं. बेरोजगार है हमजा पर आश्रित है. मायके के लोग सिखाते रहते हैं कि बेटा तुम्हारा परिवार है ही संभालना है लेकिन यहां तो मां ज्यादा बोल्ड है. पहले यह सब झेल , दम पर ऐसे हालात से है, इसलिए बेटी को पिसता देख उसे दुख होता है. कैरेक्टर आम मां से अलग हो जाता है. सीख दे जाती है जहां बेटी की डोली गई वहीं से अर्थी यह जरूरी नहीं, की सीमा होती है, और हर हिंसा का प्रतिरोध किया जाना चाहिए. ‘तू पिटती है इसलिए वह पीटता है’. जमाने की मां है जो सीख देती है कि छोड़ दे उसे, मार दे उसे’

की सुनाई मेढक और बिच्छू कहानी यादगार बन है. स्वभाव है मारना, मारेगा ही. बदरू को तब समझ में आती है जब हमजा की से उसका बच्चा नहीं रहता. इसलिए शांत है कि वह जानना चाहता है कि थाने उसके खिलाफ शिकायत किसने दी. के बाद भी उसका शैतान जगा रहता है. के घेरे में जुल्फी है, बदरू ने सब बर्दाश्त लिया है लेकिन चरित्र हनन उसे बर्दाश्त नहीं है. लेती है कि हमजा से उसको बदला लेना है. तरह उसे प्रताड़ित करना है, तरह से उसने उसे पीटा है. और जुल्फी उसके साथ हैं, की पिटाई से संतोष मिलता है. भी लगता है कि यह सब क्यों?

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अगर परिवार का पहिया नहीं चल पा रहा है तो रास्ते अलग-अलग क्यों नहीं. को रेस्पेक्ट चाहिए लेकिन क्या रेसपेक्ट हासिल जा सकती है. बाद में बदरू को समझ में आती है. उतरे हुए लोगों से शिकायत कैसी.

, बदरू और खाला मिलकर ऐसा चक्रव्यूह रचते हैं कि जगहों पर हंसी की फुहारें फूट पड़ती हैं. बातें अविश्वसनीय लगती हैं लेकिन कहीं बोर नहीं है. पर विवश करती है कि ऐसा नहीं, ऐसा होता तो. फंडा भी क्लियर करती है. प्यार में इस तरह क्या बिछ जाना कि अपना वजूद ही खो जाए. तो तब है जब दोनों का वजूद न रहे, दोनों की खुशियां गम दोनों की महत्वाकांक्षा एक हो जाएं. प्यार हो ही नहीं हो सकता जिसमें सामने वाले की कोई अहमियत ही न हो. न . शिद्दत के साथ यह अहसास भी कराती है कि केवल कहने से कुछ होता, से कुछ होता, धरातल पर उतारने है.

जान हैं आलिया भट्ट

ने बदरू के किरदार में बेहतरीन काम किया है. ‘उड़ता पंजाब’, ‘राजी’ के बाद एक और एक यादगार लिए उन्हें याद रखा जाएगा. में वो कहीं न कहीं बनावटी लग रही थीं. के हिसाब से भी वह उस रोल में फिट होने उन्हें मुश्किल हो रही थी. में दबंग दिख रही थीं लेकिन इकहरा बदन उससे तालमेल नहीं बिठा पा रहा था. में ऐसा नहीं, अभिनय में है. उससे उपजी हुई मजबूरी आंखों में झलकती है. बातों की जगह केवल आंखों ने कह दिया है. जितनी भी फिल्में उन्होंने हैं उसमें सबसे यादगार रोल रहा है.

खाला (शेफाली शाह) जुल्फी (रोशन मैथ्यू) ने भी काबिले तारीफ काम किया है, खाला एक ऐसी मां हैं भी को तैयार हैं. को हालातों पर छोड़ने के खिलाफ हैं. बताने हैं. को हैं. निर्णय हैं. दर्द है अपनी कहानी है. बदरू को उन्होंने कैसे-कैसे पाला है यह उन दोनों के सिवा कोई नहीं जानता. दिलाने में दोनों सफल रहती हैं.

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‘जुल्फी’ पागल दीवाना लगता है. से बहुत , बेहद जिम्मेदार इंसान, ऐसा लगता है कि वह बदरू चाहता है लेकिन उसका क्रश कोई और है, प्यार को उम्र में नहीं बांधता, जिसे है उसके हर उसके साथ चलने में यकीन है. कसाई (राजेश शर्मा) खामोश किरदार है. है लेकिन हर गलत में बदरू खाला के साथ खड़ा है, इस फिल्म में राजेश का वो आंखों ही बहुत कुछ कह जाते हैं. किरदार में ढल जाना उनकी फितरत में है. हो या बड़ा लेकिन फिल्म में अगर वो हैं तो उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते.

ने हमजा के रोल में जान डाल दी है. अगर फिल्म देखते-देखते और पात्र से प्यार और घृणा हो तो यह उसकी सफलता कही जाती है. प्रति है. लोग हैं. कर हैं. कुटिल, जाहिल, कैसे हो है. की छौंक में कोई सामने को कितना बना सकता है. वर्मा ने अपने अभिनय से साबित कर दिया है.

कुल मिलाकर ‘डॉर्लिंग्स’ घरेलू हिंसा के खिलाफ एक संदेश देने में कामयाब रहती है. बदरू और हमजा के माध्यम से घर-घर की कहानी को सामने रखती है. मजबूर है. नहीं पाती. पटरियों पर परिणाम दिखाने की कोशिश की गई है वह सबको हजम नहीं हो सकता. भी . , संविधान ने, समाज ने जो रास्ता बताए हैं वो किताबी भले ही लेकिन उससे एकदम अलग हटकर दिखना, चलना स्वीकार्य नहीं हो पाता. वजह है कि इंटरवल तक फिल्म जितनी मजबूत दिखती है, बाद अंत तक थोड़ी थोड़ी कमजोर ही होती जाती है. है. लगता है कि कोई और रास्ता तय किया गया था लेकिन पर बस नहीं रहा और कथ्य हाथ से निकल गया.

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