Saturday, November 26, 2022
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स्विट्जरलैंड छोड़ भारत आकर बन गए ब्रह्मचारी, अब आश्रम में बच्चों को दे रहे वैदिक शिक्षा – Usht Strabble came to India leaving Switzerland, became Swami Ashutosh And took Brahmacharya now giving Vedic education to children ntc

पूरब की लाली का असर पश्चिम पर कुछ इस तरह से पड़ा कि स्विट्जरलैंड आए स्ट्राबल बन गए आशुतोष और धारण कर लिया जीवन. कहानी यहीं पर खत्म नहीं होती, भारत के वेद पुराण और धर्म ग्रंथों से प्रभावित होकर उन्होंने अपना जीवन प्रचार में समर्पित कर दिया पर वे वाली पीढ़ी पुराणों का पाठ उन्हें वैदिक दे हैं. इनके आश्रम में जो बच्चे शिक्षा ले रहे हैं, वे शैक्षणिक बोधता पौराणिक, और सांस्कृतिक ज्ञान भी अर्जित कर रहे हैं. साथ ही आचार्य आशुतोष के साथ उसके कई प्रशिक्षक भी जुड़े हैं जो से शिक्षा लेकर आगे बच्चों तक पहुंचा रहे हैं.

का गुरुकुल लगता है आश्रम

दरअसल, उत्तरकाशी से 15 किलोमीटर दूर ब्लाक के गजौली गांव के जब आप इस आश्रम में , ऐसा मानो किसी ऐसे में हैं जो वैदिक काल . पर आपको चारों दिशाओं से वेदों के सुनाई पड़ते हैं. कदम उठेंगे. यह आश्रम किसी गुरुकुल से नहीं है क्योंकि यहां अनुशासन, , , , स्वाध्याय ही इसके परिचायक हैं. यहां के बच्चे वेद पुराण और धर्म ग्रंथों का नियमित रूप से पाठ करते हैं. और इसलिए इस आश्रम में माता पिता अपने बच्चों को दूर दूर से भेजते हैं.

1975 में आया बड़ा बदलाव

के बीच स्थित आश्रम में अपने कक्ष के बाहर एक हल्की मुस्कुराहट के साथ 76 स्वामी आशुतोष बताते हैं कि उन्हें बचपन से ही मेडिटेशन में बहुत थी. मेडिटेशन में दौरान योग भी किया करते थे. 1975 जिंदगी में सबसे बड़ा बदलाव बनकर आया. योग के प्रणेता महर्षि महेश योगी ने योग शिविर का किया था स्विट्जरलैंड में था. आशुतोष (उस समय ऊष्ठ स्ट्रॉबल) को योग अभ्यास के रुचि थी इसलिए वे शिविर में शामिल होने के लिए चले गए. हैं कि यहीं से ही जितना उन्होंने भारतीय संस्कृति को की कोशिश की उतनी ही उनकी लालसा बढ़ती गई.

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1997

वे बड़े ही करीब से महर्षि महेश योगी की कही बातों का पालन करने लगे. इसके बाद उन्होंने महर्षि योगी से आग्रह किया कि वे उन्हें अपना शिष्य बना लें. धीरे धीरे गीता, पुराण और अन्य का अध्ययन शुरू किया. उन्होंने तय कर लिया था कि वे आजीवन ब्रम्हाचार्य का व्रत रखेंगे. क्या था स्विट्जरलैंड से केमिस्ट की नौकरी और पढ़ाई छोड़कर भारत आने का मन बना लिया. वर्ष 1997 वे भारत आए और उत्तराखंड के कौसानी में आकर वेद विद्यापीठ की नींव डाली. वे कई बार उत्तरकाशी भी गए.

कहते हैं कि उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है इसलिए उनका बहुत मन था कि वे परंपरा को पुनर्जिवित उसका विस्तार करें. इसी बात को ध्यान रखते उन्होंने शुरुआत पढ़ रहे हैं.

आश्रम

‘भारत वाकई में खूबसूरत है’

हैं कि स्विट्जरलैंड और भारत में बहुत अंतर है. कहते हैं कि स्विट्जरलैंड सुंदर लेकिन भारत में खूबसूरत है. वे कहते हैं कि, “वहां मैं इंडस्ट्री में काम करता था आज मैं प्रकृति में काम कर रहा हूं. और भारत एक ऐसा देश है जहां पर प्राचीन संस्कृति आज भी . भारत प्रकृति के बेहद समीप है और इसलिए पवित्र भी है. यहां में वादियों के हिमालय के करीब एहसास होता कि भारत कितना समृद्ध देश है , , , जीवन के आधार हैं इन्हीं में जीवन का साल छिपा हुआ है.”

वे कहते हैं कि, “मैं चाहता था यह सब अध्ययन करने के इसका विस्तार किया जाना चाहिए.और इसलिए इस आश्रम को खोलने की ठानी.” जो आचार्य शिक्षा देते हैं, उनमें से कई ऐसे जिन्होंने यहीं ग्रहण की थी. अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद वे अब यहीं पर बच्चों को पढ़ा रहे हैं.

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हैं कि चूंकि उन्होंने ब्रह्मचर्य जीवन चुना है इसलिए उनके में उनकी और भाई हैं. हैं उनकी. भी यहीं पर दो साल रहीं और खराब स्वास्थ्य के चलते उनका देहांत हो गया. भाई अपने परिवार के स्विट्जरलैंड से यहां पर आते रहते हैं.

को आगे ले जाना है सपना

मुस्कुराते हुए कहते हैं कि यह बच्चे, , और पर्वत ही उनका परिवार है. वैद्यनाथन विवेक भी पहले दिल्ली में नौकरी करते थे. के सिलसिले में अमरीका भी गए लेकिन जब आशुतोष से जब मुलाकात हुई तब उन्होंने भी जीवन की दिशा बदलकर आश्रम में सेवाएं देना शुरू कर दी. से उनके साथ कई लोग जुड़े हुए हैं. सपना यही है कि परंपरा को आगे ले जाना चाहते हैं. कि भारत एक दिन विश्वगुरु कहलाए और सोने की चिड़िया फिर आसमान में सबसे ऊंची उड़ान भरे.

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