Thursday, September 29, 2022
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प्राथमिक शिक्षा और दोपहर का भोजन-primary education and lunch

कुमार सिंह

भोजन योजना की सच्चाई यह है कि इसने प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा दिया है। गरीब और कुपोषित बच्चों को स्कूल का रास्ता दिखाया है। छात्रों की संख्या बढ़ी है। के लिए इन्हें प्रोत्साहन मिल रहा है। छोड़ने पर लगाम तो नहीं लगी है, पर उसमें कमी लाने में यह योजना कारगर सिद्ध हो रही है।

वह नींव है, जहां से भारत का निर्माण शुरू होता है। यही कारण है कि 1990 की विश्व कान्फ्रेंस में सबके लिए अनिवार्य शिक्षा की घोषणा की गई और 15 अगस्त, 1995 को सरकार ने स्कूलों में मिड-डे मील यानी मध्याह्न भोजन योजना शुरू की। ‘चलो स्कूल चलें’ से लेकर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की अवधारणा इसी दिशा में की गई संकल्पनाएं हैं।

मगर यह प्रश्न बना हुआ है कि क्या भारत में प्राथमिक शिक्षा की उत्तम व्यवस्था इतने वर्षों में हो पाई है। सवाल अभी अधूरे उत्तर के साथ फलक पर तैर रहा है। बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा निशुल्क और अनिवार्य करने का लक्ष्य नया नहीं है, इसकी यात्रा कमोबेश आजादी जितनी ही पुरानी है। इसके स्कूली शिक्षा को लेकर चित्र बहुत अच्छा उभरता हुआ दिखता नहीं है। हां, यह बात और है कि जारी प्रयास के बीच इसमें उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है, मगर कोविड-19 के दो वर्षों ने संपूर्ण स्कूली शिक्षा को चोटिल किया है।

कि 14 , 2020 को मध्याह्न भोजन योजना पर रोक लग गई थी। यह उन बच्चों के लिए अधिक घातक था, जो भोजन के लिए शिक्षा और स्कूल से जुड़े थे। हालांकि मध्याह्न भोजन योजना अब एक बार फिर अपने रास्ते पर चल पड़ा है, मगर बरसों पहले से जिन को भोजन के जरिए शिक्षा से जोड़ने का हुआ था, उनमें से कितनों की वापसी हुई है, यह पड़ताल का विषय है। इस योजना के चलते छह से चौदह वर्ष आयु वर्ग और कक्षा एक से आठ तक के लगभग बारह करोड़ बच्चे शामिल हैं।

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गौरतलब है कि सरकार की ओर से सरकारी, गैर-सरकारी और अशासकीय समेत प्राप्त विद्यालयों में कक्षा एक से लेकर आठ तक के छात्र-छात्राओं को दोपहर का भोजन कराया जाता है। 2021 इसका नाम परिवर्तित कर पीएम पोषण योजना कर दिया गया। बच्चों का बेहतर विकास हो और ज्यादा से ज्यादा बच्चे स्कूल आ सकें, इसी उद्देश्य से मिड-डे मील योजना शुरू की गई थी। वैसे औपनिवेशिक सत्ता के दिनों में ऐसा कार्यक्रम पहली बार 1925 में मद्रास नगर निगम में वंचित बच्चों के लिए शुरू किया गया था। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह योजना बच्चों को स्कूल तक लाने में सफल रही है, मगर हकीकत यह है कि जितने आंकड़े गिनाए जाते हैं, सफलता उतनी नहीं मिली है। और हकीकत के बीच के इस फासले को पाटने की जिम्मेदारी सरकार की है।

गौरतलब है कि योजना कितनी भी सशक्त और कारगर क्यों न हो, उसका निष्पादन पूरी तरह सुनिश्चित हो, ऐसा शायद ही कभी संभव हुआ हो। योजना भी इससे अलग नहीं है। ‘यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फार्मेशन सिस्टम फार एजुकेशन’ की रिपोर्ट बताती है कि देश में सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी आई है, जबकि निजी स्कूलों की संख्या बढ़ी है। के अनुसार 2018-19 में देश में पचास हजार से अधिक सरकारी स्कूल बंद हो गए। मध्याह्न भोजन योजना के बावजूद बच्चों के बीच में पढ़ाई छोड़ने का सिलसिला थमा नहीं है। की ताजा रिपोर्ट से स्पष्ट है कि कोरोना महामारी के कारण पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की संख्या और तेजी से बढ़ी है।

मिड-डे मील योजना 1997-98 तक देश के सभी राज्यों में लागू हो चुकी थी। 2002 को भी इसमें शामिल किया गया। 2014-15 यह योजना साढ़े ग्यारह लाख प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में चल रही थी। आंकड़े बताते हैं कि दस करोड़ बच्चे लाभान्वित हो रहे थे। 2011 आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार भारत में स्कूलों की संख्या पंद्रह लाख थी।

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शिक्षा के उत्तरोतर विकास को देखते हुए समझा जा सकता है कि एक दशक बाद यह आंकड़ा और गगनचुंबी हुआ होगा। जिस देश में हर चौथा व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे हो और यही आंकड़ा अशिक्षा का भी हो, तो ऐसी योजनाओं का मूल्य कहीं अधिक बड़ा हो जाता है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि शिक्षा गरीबी और आर्थिक तंगी में बहुत मुश्किल से पनपती है।

संदर्भ निहित बात यह भी है कि कक्षा एक से पांच तक के सभी बच्चों को प्रतिदिन सौ ग्राम अनाज, दाल और सब्जी दिया जा रहा है और कक्षा छठवीं से आठवीं तक के बच्चों को यही खाद्य सामग्री डेढ़ सौ ग्राम दी जा रही है। यह है कि बच्चों को कैलोरी और प्रोटीन के अलावा लौह और फोलिक एसिड जैसे सूक्ष्म पोषक तत्त्व भी प्रदान किए जाएं। है कि मध्याह्न भोजन योजना केवल एक योजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के अनुसार प्राथमिक और उच्च प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों का यह कानूनी अधिकार है।

प्राथमिक शिक्षा के प्रसार और उन्नयन के लिए 1957 में सरकार ने अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षा आयोग का गठन किया था। इसी क्रम में 1965 में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश की, जिसमें बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक धर्म, जाति और लिंग के छात्रों के लिए शैक्षिक अवसरों को समान बनाए रखने पर बल दिया गया। आयोग के चलते राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 प्रकाश में आई। भी शिक्षा को निशुल्क और अनिवार्य करने को लेकर ठोस उपाय देखने को मिले। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 से शैक्षणिक वातावरण में एक नई अवधारणा अवतरित हुई, वहीं 1985 का आपरेशन ब्लैक बोर्ड आधारभूत सुविधाओं से ओतप्रोत था। में नई शिक्षा नीति 2020 से बेहिसाब उम्मीदें जुड़ी हैं।

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से ही मानव मस्तिष्क को उपयोगी बनाया जा सकता है। वर्तमान युग सूचनाओं का है और इन्हीं सूचनाओं का संकलन और उनकी प्रस्तुति आज की दुनिया में बौद्धिकता का प्रमाण है। ऐसे में नौनिहालों की शिक्षा पर न तो कोई समझौता किया जा सकता है और न ऐसी कोई समझ लाई जा सकती है, जो इनके शिक्षा अधिकार को तनिक भी चोट पहुंचाए। मध्याह्न भोजन योजना को लेकर किसी तरह का कोई घोटाला और लापरवाही न हो, इसके लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक समिति गठित की। समिति राष्ट्रीय स्तर पर इस योजना की निगरानी रखती है।

इसके जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि देश के हर स्कूल में सही तरह का खाना बच्चों को दिया जाए। इसके, इसमें इतनी त्रुटियां हैं कि शिकायतों का अंबार लगा रहता है। मध्याह्न भोजन योजना से बच्चे बीमार भी हुए हैं और उनकी मौत के आंकड़े भी समय-समय पर देखे गए हैं। योजना के लाभ बच्चों को जहां मिलता है वहीं इसका दुरुपयोग भी कइयों के द्वारा जारी है। यह योजना लगभग तीन दशक पुरानी हो रही है, फिर भी भारत भुखमरी के सूचकांक में अपना स्तर सुधारने में नाकाम ही रहा है।

सबके बावजूद मध्याह्न भोजन योजना की सच्चाई यह है कि इसने प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा दिया है। गरीब और कुपोषित बच्चों को स्कूल का रास्ता दिखाया है। छात्रों की संख्या बढ़ी है। के लिए इन्हें प्रोत्साहन मिल रहा है। छोड़ने पर लगाम तो नहीं लगी है, पर उसमें कमी लाने में यह योजना कारगर सिद्ध हो रही है। कुल मिलाकर यह कहना वाजिब होगा कि मध्याह्न भोजन योजना देश के करोड़ों नौनिहालों की वह उम्मीद है, जहां शिक्षा के साथ पेट की भी चिंता की जाती है और उनके पोषण को सुधार कर सीखने के स्तर को बढ़ा रही है।


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