Monday, December 5, 2022
HomeEntertainmentकैम्ब्रिज जाने से पहले पिता की मौत, पटना की गलियों में बेचना...

कैम्ब्रिज जाने से पहले पिता की मौत, पटना की गलियों में बेचना पड़ा पापड़; लाइफ पर बनी फिल्म | Super 30 Founder Anand Kumar Success and Inspirational Story | Super 30 Life Journey

  • Hindi news
  • Db original
  • Super 30 founder Anand Kumar success and inspiring story | Super 30 life journey

2:

1993-94 था। में एडमिशन के लिए ऑफर आया था। की तैयारी चल रही थी। खुश थी कि बेटा कैम्ब्रिज जाएगा, लेकिन हमारे पास हवाई जहाज के टिकट तक के पैसे नहीं थे।

से पिताजी थोड़ी टेंशन में थे। एक रोज रात में हम लोग खाना खाने के बाद सोने जा रहे थे, तभी अचानक पिताजी की सांस फंसने की आवाज आई। 11 थे। हम लोग दौड़ते हुए उनके पास गए, लेकिन तब तक शायद उनकी मौत हो चुकी थी।

को लगा कि वो बेहोश हैं। था। चारों तरफ घुटनेभर पानी जमा था। -जाने का साधन नहीं। पड़ोसी का ठेला लेकर पिताजी को पटना हॉस्पिटल ले गए। ने देखते ही मृत घोषित कर दिया।

तरफ कैम्ब्रिज जाने का सपना टूटा, दूसरी तरफ पिताजी का इस तरह से अचानक गुजर जाना… लगा अब तो सब कुछ खत्म हो गया।

‘सुपर 30’ के फाउंडर आनंद कुमार आज भी अपने उन दिनों की बातों को याद करते हुए ठहर जाते हैं।

आनंद कुमार फिर थोड़ा संभलते हुए कहते हैं, ‘पिताजी हमेशा कहते थे- समझौता से बेहतर संघर्ष होता है। नहीं करना।’

बचपन के दिनों में लौटते हैं। बताते हैं- मेरा जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ, जहां गरीबी थी। रेलवे ट्रैक के किनारे छोटा-सा किराए का मकान था। पिताजी डाक विभाग में कर्मचारी थे, लेकिन तनख्वाह इतनी नहीं थी कि हमें अच्छे स्कूल में पढ़ा पाएं। तक की पढ़ाई एक प्राइवेट स्कूल में हुई।

स्कूल जाने के लिए अच्छे कपड़े नहीं थे। बच्चे टेरीकॉट का कपड़ा पहनते थे। ️ कॉटन कपड़ा सबसे सस्ता माना जाता था।

सभी स्टूडेंट एल्युमिनियम का बना थैला लेकर आते थे, जबकि मैं टिन का बना थैला लेकर आता था। हमें हमेशा लगता था कि पैसा होने पर ही पढ़ाई अच्छे से की जा सकती है, लेकिन पिताजी कहते थे, ‘पढ़ाई पैसे से नहीं, मेहनत से होती है।’

See also  Taapsee Pannu Heated Argument With Paparazzi Video Viral

आनंद कहते हैं- दूसरी क्लास के बाद सरकारी स्कूल में पढ़ाई करने लगा। घर के सामने एक नाला था और उस पार एक सरदार जी का घर। बच्चों को पढ़ाने के लिए टीचर कई दिनों से नहीं आ रहे थे, तो मुझे पढ़ाने के लिए कहा गया। वक्त छठी क्लास में था। तभी से एक-दो बच्चों को पढ़ाने लगा।

जब 10वीं पास किया, तो सारे दोस्त दिल्ली जा रहे थे, लेकिन मेरे पास पैसे नहीं थे कि किसी बड़े शहर में रहकर पढ़ाई करूं। करने के बाद पटना यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन में दाखिला ले लिया।

इसी दौरान मैंने मैथ्स के कुछ फॉर्मूले और थ्योरी को ईजाद किया, जो कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के मैथमेटिक्स जर्नल में छपा और मुझे कैम्ब्रिज से एडमिशन के लिए ऑफर आया, लेकिन अचानक से पिताजी की मृत्यु के बाद सब कुछ खत्म हो गया।

उन दिनों के संघर्ष को फिर से ताजा करते हैं। कहते हैं- लोगों ने कहना शुरू किया कि पिता की जगह अनुकंपा (सरकारी नौकरी के दौरान किसी व्यक्ति की मौत होने पर उसके किसी एक आश्रित को दी जाने वाली नौकरी) पर जॉइन कर लो।

मां पढ़ी-लिखी नहीं थीं कि वो नौकरी कर सकें। (प्रणव कुमार) था। दिनों बीएचयू में वॉयलिन सीख रहा था। की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई। पटना गया।

पापड़ बनाने का काम शुरू किया। हम दोनों भाई दिन में पढ़ते थे और शाम को ‘आनंद पापड़’ ले लो… ‘आनंद पापड़’ ले लो… पटना की सड़कों, गलियों में घूम-घूम कर पापड़ बेचते थे। सिलसिला करीब 4 साल तक चलता रहा।

1998-99 बीत रहा था। दिन भाई ने कहा, ‘कब तक ऐसे पापड़ बेचते रहेंगे। पढ़ाना शुरू कीजिए।’

आनंद कुमार ने शुरुआत स्लम के दो बच्चों को पढ़ाने से किया।।धीरे-धीरे बच्चे बढ़ने लगे।  साल में 600 हो गए।  तरह से 'रामानुजन स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स' की शुरुआत हुई।

आनंद कुमार ने शुरुआत स्लम के दो बच्चों को पढ़ाने से किया।।धीरे-धीरे बच्चे बढ़ने लगे। साल में 600 हो गए। तरह से ‘रामानुजन स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स’ की शुरुआत हुई।

‘फिर सुपर-30’ की शुरुआत कैसे की?

आनंद आशान्वित नजरों से कहते हैं- कोचिंग में कई ऐसे टैलेंटेड बच्चे बहुत ही गरीब परिवार से आते थे, जो आईआईटी जैसे एग्जाम क्रैक करना चाहते थे, लेकिन उनके पास खाने तक के पैसे नहीं होते थे।

See also  Gunasekhar-Samantha's Shaakuntalam releasing on November 4

लगा कि यदि इन बच्चों को अच्छे तरीके से पढ़ाया जाए, तो ये भी अपनी लाइफ में बेहतर कर सकते हैं। 2002 ‘सुपर 30’ शुरुआत की। ‘रामानुजन कोचिंग’ से जो पैसा आता था, वह ‘सुपर 30’ में सिलेक्ट होने वाले बच्चों की पढ़ाई पर खर्च होता था।

फ्री ऑफ कॉस्ट हमारे घर पर रखकर पढ़ाई करने लगे। बच्चों के लिए खाना बनाती थी। की देखरेख करता था।

बैच को याद करते हुए आनंद कुछ दिलचस्प बातें बताते हैं। कहते हैं- हमें लगा था कि 30 बच्चों में से कम-से-कम 5 बच्चे तो आईआईटी क्रैक कर ही लेंगे, लेकिन पहले साल ही 30 में से 18 बच्चों ने आईआईटी क्रैक कर लिया। कारवां पड़ा।

हैं- 2008 में तो गजब हो गया। 30 में 30 बच्चों ने आईआईटी एग्जाम क्वालिफाई किया। अभी तक हमारे 500 से ज्यादा बच्चे आईआईटी क्रैक कर चुके हैं।

'सुपर-30' की ये शुरुआती दिनों की तस्वीर है।  आनंद कहते हैं, उन दिनों पैसे नहीं थे, तो टिन के घर में कोचिंग चलता था।

‘सुपर-30’ की ये शुरुआती दिनों की तस्वीर है। आनंद कहते हैं, उन दिनों पैसे नहीं थे, तो टिन के घर में कोचिंग चलता था।

मेरी लाइफ के ऊपर एक किताब लिखी गई। जिसके बाद बॉलीवुड इंडस्ट्री के कई लोगों ने मेरे बायोपिक पर फिल्म बनाने के लिए एप्रोच करना शुरू किया। ‘सुपर-30’ फिल्म के डायरेक्टर विकास बहल से 2016-17 में मुलाकात हुई थी। फिल्म बननी शुरू हुई।

वो कहते हैं- जब ऋतिक रोशन को खुद के कैरेक्टर के लिए चुना तो लोगों ने कहा कि तुमने तो बहुत बड़ी भूल कर दी। अंग्रेज जैसा दिखने वाला हीरो गांव-देहात वाले ‘आनंद कुमार’ का रोल प्ले करेगा? फिल्म कितनी शानदार बनी। खूब किया।

आनंद कहते हैं कि अब सुपर-30 का विस्तार करने की तैयारी चल रही है। बच्चों की संख्या बढ़ाने और अन्य राज्यों में भी ब्रांच खोलने को लेकर काम हो रहा है।

See also  Disappointing opening for RRR at the Japan box office

आखिर में अपने तीन छात्रों की कहानी भी शेयर करते हैं। …

  • 2009-10 था। नाम के एक लड़के के पिता कोलकाता में ट्रक ड्राइवर थे। धर्मपाल ने जब आईआईटी क्वालीफाई करने के बाद अपने पापा को फोन किया, तो उसके पापा ने कहा, ‘क्या… आईटीआई पास किए हो।’ , उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि उनका बेटा आईआईटी क्वालीफाई कर गया है।
  • है। वो इतनी गरीबी से जूझ रहा था कि उसके पास खाने तक के पैसे नहीं थे। की एक छोटी सी दुकान चलाती थीं। टेस्ट देने के लिए वो बस के पीछे लटक कर पटना आया था और आज एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर रहा है।
  • नालंदा का एक लड़का प्रेम पाल है, जिसका अपना घर नहीं था। उसके घर उखाड़ दिए थे। प्लास्टिक के घर में रहता था। इसरो में साइंटिस्ट है।

कहानी की ये तीन स्टोरी भी पढ़िए…

1. ने पहचान बताने यौन शोषण किया, में मिला नव्या सिंह नाम; में मचा रहीं धमाल

  • इंडिया ट्रांसक्वीन की ब्रांड एंबेसडर, एक्टर मॉडल नव्या सिंह की कहानी- स्कूल में दोस्त मेरे साथ बदतमीजी करते थे। यहां से वहां रख देते थे। यहां तक ​​​​ मेरे दोस्तों ने मेरी पहचान बताने के लिए मेरा यौन शोषण किया। (खबर पढ़िए)

2. मुझे लड़के नहीं, लड़कियां पसंद हैं:16 पन्नों का लेटर लिखकर पापा को बताई अपनी आइडेंटिटी, मुझे एक्सेप्ट करने में मां को भी लगे 4 साल

  • के जोधपुर की अंकिता मेहरा की कहानी- 2017-18 का साल था। पापा को मुंबई में एक चाय की टपरी पर बुलाया। 16 का एक लेटर दिया। मैंने अपनी आइडेंटिटी के बारे में लिखा था। (पूरी खबर )

3. पूजा को मुंबई दिया रेखा?; कभी चलते-चलते लोग चॉकलेट देते थे और गंदी हरकतें करते थे

  • कोलकाता के पॉल्स की कहानी- 12 साल पहले घर-परिवार छोड़कर मुंबई आ गईं। नाम मिला पूजा शर्मा, लेकिन कुछ सालों बाद मुंबई लोकल ट्रेन ने रेखा के नाम से मशहूर कर दिया। (खबर पढ़िए)

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments